ज़ह्र है हुस्न या दवा है क्यूँँ
जिस से भी दिल लगे ख़फ़ा है क्यूँ
हम ने बुझ कर भी दिल जलाया है
शम्अ' ही शम्अ' हर दिशा है क्यूँ
कौन सा राज़ है तअल्लुक़ में
जो कहीं भी न बोलता है क्यूँ
दिल जिसे देख कर न बिछला था
अब उसी पर ये इल्तिजा है क्यूँ
ज़ाहिदों कब तलक गुनाहों पर
ये ख़ुदा की सदा-सदा है क्यूँ
जिस्म हर सू लहू में तर क्यूँ है
इश्क़ ही इश्क़ की सज़ा है क्यूँ
शोर है फिर से गुमशुदा दिल का
ये मुक़द्दर ही बद-दुआ है क्यूँ
तू भी मुँह फेर कर गया यूँ देव
अब ये आईना बेहया है क्यूँ
देव तू भी अगर है अहल-ए-सुख़न
हर ग़ज़ल में ये सिलसिला है क्यूँ
— Amit Nandan Dev















