अब कोई दर्द सर नहीं आता
अब तो कुछ भी असर नहीं आता
लफ़्ज़ बेहाल है दु'आओं में
और दिल पे बसर नहीं आता
हम ने हर रंज-ओ-ग़म से रिश्ता किया
फिर भी वो हम सफ़र नहीं आता
वक़्त ठहरा है आइनों के पास
आदमी दर-ब-दर नहीं आता
हुस्न से अब भी ख़ौफ़ खाता हूँ
ख़ुद पे बस वो नज़र नहीं आता
मैं ने हर रोज़ मौत माँगी थी
अब वो भी बे-ख़बर नहीं आता
लोग कहते हैं जी रहा हूँ मैं
क्या करें ये हुनर नहीं आता
शहर अब भी वही है तन्हा सा
घर मगर अब उधर नहीं आता
कितनी ख़ामोश हो गईं साँसें
तेरा बस ज़िक्र कर नहीं आता
देव उस बज़्म में गया ही नहीं
जिस में तेरा असर नहीं आता
— Amit Nandan Dev















