कभी ख़्वाब बन के निखरते हैं हम भी

कभी अश्क में रंग भरते हैं हम भी

सफ़र की थकन ओढ़ते हैं तबस्सुम
कभी हँस के ख़ामोश मरते हैं हम भी

जला कर के ख़ुद को ही अपने दिए से
अँधेरे को रौशन भी करते हैं हम भी

सितारों की चुप में हैं ज़ख़्मों के अफ़्साँ
कभी साँस में शोर भरते हैं हम भी

लपट जिस तरह सर्द छाँव में रोए
उसी दर्द को गीत करते हैं हम भी

हयातों की तहरीर में जल रही जो
उसी राख से ख़ुद सँवरते हैं हम भी

हवा की तरह बे-सदा हो चले हैं
मगर हर जगह पर बिखरते हैं हम भी

अदब में छुपा है हमारा फ़साना
कभी ख़ून बनकर उभरते हैं हम भी

ये 'देव' अब है अक्सों में बिस्मिल सा लिक्खा
किसी ख़्वाब की हद से डरते हैं हम भी

क़यामत को आवाज़ देते हैं 'देव' अब
कि ख़ामोशियों में उतरते हैं हम भी

— Amit Nandan Dev

More by Amit Nandan Dev

Other ghazal from the same pen

See all from Amit Nandan Dev →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling