निकल पड़ा हूँ मैं फिर बाद-ए-कुह्न-यार चले

जिधर भी दिल का इशारा हो बे-क़रार चले

निकल पड़े हैं सुलगते हुए शरार चले
न कोई राह न मंज़िल न रहगुज़ार चले

उठा के बस्त-ए-गिरेबाँ में चंद गर्दिश-ए-ग़म
तलाश-ए-कू-ए-वफ़ा में भी हम बहार चले

किसी ने पूछा कि क्या हाल है बिछड़ने का
हम अपनी रूह के टुकड़ों में बार-बार चले

न था वो ज़िक्र मगर दिल ने फिर उछाली बात
कि यूँ ही ज़ख़्म से निकले यूँ ही बहार चले

सुनाई दे कहीं फिर साज़-ए-दिल की धीमी सदा
कि कब तलक ये ख़मोशी का कारोबार चले

नसीब क्या था हमें लफ़्ज़ क्या मुयस्सर थे
कि एक नाम पे बस दर-ब-दर ख़ुमार चले

किसी ने हाथ बढ़ाया न कोई हमदम था
हम अपने साए को ले कर भी बे-क़रार चले

निशात-ए-ग़म से गुज़र कर ख़िज़ाँ की राह चले
कि फिर बहार की सूरत सुलूक-ए-दार चले

तमाम उम्र बयानों से सख़्त ज़ख़्म मिले
कभी तो ख़ून-ए-हक़ीक़त में इस्तिख़ार चले

हमें ख़बर थी कि इस राह में उजाले कम
मगर जुनूँ की तहम्मुल में बार-बार चले

ग़मों का शौक़ था इतना कि ख़ुद भी रुक न सके
कहीं बहार से निकले तो सू-ए-दार चले

हिजाब-ए-शहर में हम क़ाफ़िला न बन पाए
तो सुर्ख़-रू कभी कूचा कभी मज़ार चले

जो ख़्वाब देख के निकले थे कूचा-ए-ग़म से
वो ख़्वाब भी मिरे आख़िर मिज़ा-ए-दार चले

गुनाह था कि बग़ावत ज़माना देख चुका
हम एक जश्न में शामिल थे फिर शिकार चले

मुझे न थी कभी मंज़िल से 'देव' कोई निस्बत
मगर जो राह में रोया वो शहसवार चले

सबा के पास थे नक़्शे तमाम दहर के ग़म
मगर वो सोचती किस दम किधर ग़ुबार चले

हवा-ए-दश्त में जलते हैं ताज भी सर भी
हम एक चराग़ बुझाने का इख़्तियार चले

किसी को शौक़ था अज़्मत किसी को लालच थी
हम ऐसे लोग थे जो ख़ाक के क़रार चले

ख़ुदा ने हम से कहा था कि हौसला रखना
मगर बशर थे जहाँ के हर इख़्तियार चले

न अब वो सोज़ न रंगीनियों का हाल कोई
हम अपने दिल की गिरह तक लिए बिसार चले

वही अज़ाब कि हर सम्त आरज़ू ठहरी
किसी को देख के रोना किसी को प्यार चले

हयात-ए-ज़ीस्त का नक़्शा मिटा चुके 'देव' अब
हम अपने ख़्वाब से निकले तो यादगार चले

— Amit Nandan Dev

More by Amit Nandan Dev

Other ghazal from the same pen

See all from Amit Nandan Dev →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling