जो नज़र आता है सब को आसमाँ कुछ और है
देखने वालों की आँखों का जहाँ कुछ और है
इब्तिदा कुछ और थी तो इंतिहाँ कुछ और है
लब पे आए जब तो देखा कहकशाँ कुछ और है
जो कहा उस्ताद ने वो तो सही था लफ़्ज़ में
पर अमल के इंतिहाँ में इम्तिहाँ कुछ और है
ख़्वाब में जो बस्तियाँ हम ने बसाई थीं कभी
आँख खुलते ही समझ आया मकाँ कुछ और है
हम ने हर सू ढूँढ़ ली ता'बीर ख़्वाबों की मगर
क़िस्सा-गो कुछ और था अंदाज़-ए-बयाँ कुछ और है
बात सीधी भी कहूँ तो लगती है उलझी हुई
हर निगह हर लफ़्ज़ हर जुम्ला यहाँ कुछ और है
जो दिखा था आइनों में इक सलीबों का हुजूम
रूह बोले जा रही थी कारवाँ कुछ और है
हर सुख़न में लफ़्ज़ का चेहरा तो वैसा ही रहा
तर्ज़-ए-इदराक़-ए-दिल-ओ-जाँ का जहाँ कुछ और है
देव जो दिखता है दुनिया में वो पर्दा है फ़क़त
जो नज़र आता नहीं वो साएबाँ कुछ और है















