रास आती है कहाँ अब ये जहाँ-बानी मुझे
खींचती है दश्त की जानिब ये ज़िंदानी मुझे
ज़िंदगी ने बख़्श दी है रूह-उर्यानी मुझे
ढूँढ़ती है ख़ल्वतों में अपनी पिन्हानी मुझे
क्या सितम है हर क़दम पर इम्तिहाँ-दर-इम्तिहाँ
ज़िंदगी ने दी नहीं है कोई आसानी मुझे
ज़िंदगी की धूप में जलकर हुआ हूँ आइना
साफ़ दिखती है अब अपनी ही पशेमानी मुझे
ज़ख़्म ही मरहम लगे हैं अब मिरे हक़ में यहाँ
रास आई है अज़ाबों की फ़रावानी मुझे
अक्स अपना ढूँढ़ता हूँ रफ़्तगाँ की भीड़ में
देख कर मुझ को हुई है आज हैरानी मुझे
मैं फ़क़त इक ज़र्रा-ए-ख़ाकी ब-ज़ाहिर ऐ ख़ुदा
इश्क़ ने उस के किया है आज ला-सानी मुझे
इश्क़ में सहनी पड़ी है हर जफ़ा चुपचाप ही
मार डालेगी किसी दिन उसकी मनमानी मुझे
राख के ज़ेर-ए-कफ़न भी आग ज़िंदा है अभी
फिर मुकम्मल कर न दे ये शोला-अफ़्शानी मुझे
हाल-ए-दिल जब 'देव' लिक्खा ऊला मिसरे में कभी
आइना सा दे गया है मिस्रा-ए-सानी मुझे















