शे'र ख़ुद को ही सुनाता रहता हूँ मैं
अपनी तन्हाई मिटाता रहता हूँ मैं
बस यही इक काम तो सीखा है मैंने
हाँ सभी के दिल दुखाता रहता हूँ मैं
शायरी मुझको कहाँ आती है यारों
अपना दुःख ही तो सुनाता रहता हूँ मैं
अब तो आदत पड़ गई है यार मुझको
सब सेे यूँँ ही धोखा खाता रहता हूँ मैं
मुझको तो जन्नत मिलेगी मेरे यारों
माँ के पैरों को दबाता रहता हूँ मैं
दिल मेरा मिलता नहीं यारों किसी से
हाथ पर सब सेे मिलाता रहता हूँ मैं
मैं ज़ियादा बातें तो करता नहीं हूँ
आजकल बस ग़ज़लें गाता रहता हूँ मैं
आज फिर मिलने गया था मैं ‘अमित’ से
शायरों के पास जाता रहता हूँ मैं
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