तेरी उम्मीद, जान का मंज़र
कुछ नहीं है जहान का मंज़र
मेरे वहम-ओ-गुमान का मंज़र
फर्श पर आसमान का मंज़र
जागे दो जिस्म और हुआ ये फिर
सो गया दरमियान का मंज़र
ये सवालात कब से हाएल है
उस पे फिर इम्तिहान का मंज़र
घर बना कर जो सतरें खैंचीं हैं
ख़ुश नहीं है मकान का मंज़र
दिल है बच्चा सा, सोच बूढ़ी है
और ये है नौजवान का मंज़र
— Amritanshu Sharma















