तेरी उम्मीद, जान का मंज़र
कुछ नहीं है जहान का मंज़र
मेरे वहम-ओ-गुमान का मंज़र
फर्श पर आसमान का मंज़र
जागे दो जिस्म और हुआ ये फिर
सो गया दरमियान का मंज़र
ये सवालात कब से हाएल है
उसपे फिर इम्तिहान का मंज़र
घर बनाकर जो सतरें खैंचीं हैं
खुश नहीं है मकान का मंज़र
दिल है बच्चा सा, सोच बूढ़ी है
और ये है नौजवान का मंज़र
दिल की सिलवट न आए चेहरे पर
है यही खानदान का मंज़र
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