इक भरा घर सँभालती है माँ

अपने बच्चों को पालती है माँ

दुख उठा कर दुआएँ दे दे के
हर मुसीबत को टालती है माँ

आग पे रख के सब्र की हांडी
रोज़ कंकर उबालती है माँ

गुनगुनाती है लोरियाँ अक्सर
गोद में जब उछालती है माँ

कर के ताकीद झूठ मत बोलो
सच के साँचे में ढालती है माँ

बच्चे बाहर निकाल देते हैं
किस को घर से निकालती है माँ

फ़िक़्र-ए-अंजुम जहाँ है गोता जन
वो सेमुंदर खंगालती है माँ

— Anjum Lucknowi

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