फ़ुर्क़त में फ़ुर्क़त का बोझा ढोते हैं

वस्ल जलाकर राख बना ख़ुश होते हैं

दिन भर ठोकर पर ठोकर भी लगती है
रातों को रातों रातों में खोते हैं

हंँसते हैं तो हा हा हा हा हंँसते हैं
रोते हैं तो हौले हौले रोते हैं

साबुत पेड़ों को वहशत से छरते हैं
तुख़्म वहाँ बहते पानी में बोते हैं

सब को नासेह बनकर जो समझाते हैं
ख़ुद उन बातों में वो उलझे होते हैं

— Anmol Mishra

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