फटे मुक़द्दर पे रख के खद्दर हुई सिकंदर उदास नस्लेंज़मीन फाड़ी निचोड़े बादल बनाए सागर उदास नस्लेंसुलगते ख़्वाबों की राख ले कर गढ़े थे पुतले जो टेढ़े मेढ़ेहँसी के मंतर से जान फूँके उन्हीं के अंदर उदास नस्लें— Anmol Mishra