मैं ने तब तब क़रार पाया है
पास जब ग़म-गुसार आया है
मुझ को कुछ भी नज़र नहीं आता
दरमियाँ जब गुबार आया है
चल के उन को सलाम करते हैं
पीर-ओ-मुर्शिद का द्वार आया है
मुझ को खानी पड़ी हैं कुछ क़स
में
उस को तब ए'तिबार आया है
उस की सूरत हसीन लगती है
उस पे काफ़ी निखार आया है
— Ansar Eatvi















