सच्चाई है कि ऐसे भी मंज़र मिले मुझे
जब प्यास मिट गई तो समुंदर मिले मुझे
हाथों को जिन के चूमा हैं अपना जिसे कहा
इक दिन उन्हीं के हाथों में ख़ंजर मिले मुझे
ठोकर के डर से उन को हटाता चला गया
सब को लगा कि क़ीमती पत्थर मिले मुझे
पिछली दफ़ा में पल में ही नाकाम हो गए
फिर इस दफ़ा में सैकड़ों लश्कर मिले मुझे
— Ansar Eatvi















