हवाओं के नग़्

में जिधर जा रहे हैं
वहीं के मुसाफ़िर ठहर जा रहे हैं

तसल्ली ठिकानों पे मिलती नहीं है
बहुत हार के आज घर जा रहे हैं

तमाशा तमाशे से बढ़कर हुआ है
यहाँ हो के सब बे-ख़बर जा रहे हैं

जिन्हें आज़माने का फ़न आ गया था
वो ख़ुद हो के मद्देनज़र जा रहे हैं

उन्हें तो कोई जानता ही नहीं था
वो क्या देखने डाकघर जा रहे हैं

परिंदे भी मुड़कर नहीं आएँगे क्या
दरख़्तों के दिन अब गुज़र जा रहे हैं

किसी एक मौसम ने छीना है सब कुछ
सो हम ये समाँ छोड़कर जा रहे हैं

हवाओं ने नमकीन आँसू छुए हैं
इसी से मिरे ज़ख़्म भर जा रहे हैं

हर इक शाम अपनी हदें तोड़कर के
ये दोनों किनारे किधर जा रहे हैं

— Anshika Shukla

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