कहानी नई रोज़ लिखकर मिटानी
न आसान है ये मेरी ज़िंदगानी
ज़रा सोच कर इश्क़ करना यहाँ तुम
रिवायत पड़ेगी ये तुम को निभानी
ये नाज़ुक ग़ज़ल और शराफ़त के क़िस्से
किसी की हैं बातें किसी की कहानी
कई रोज़ के बा'द उन से मिले जब
न मुँह से निकाली वो बातें पुरानी
करो याद मौसम ज़रा वो पुराना
वो भीगे बदन पे पिघलता सा पानी
— anupam shah















