कि ख़त में लिख दिया अहवाल अच्छा
जो बाक़ी और है फ़िलहाल अच्छा
तुम्हें उजड़े दरख़्तों की हैं फ़िक्रें
जो ऐसा है तो मैं पामाल अच्छा
ये मुझ को क्या परीशाँ कर रहा है
तुम्हारा तिल तुम्हारा गाल अच्छा
यही इक झूठ बस बोला है तुम से
तुम्हारे बिन है मेरा हाल अच्छा
अभी तक हूँ चहकता याद कर के
ये जो गुज़रा है पिछला साल अच्छा
— anupam shah















