मुझ को तब थोड़ा सा गुमाँ होतारस्म को छोड़ तू यहाँ होतावक़्त तब मेरे साथ था वर्नामैं ज़माने से बेनिशाँ होतातू कभी छोड़ के नहीं जाताकाश इस जिस्म का रुआँ होताएक दूजे को देखा करते जबमैं ज़मीं और तू आसमाँ होतामैं भी पत्ता हरा भरा था कभीहोता अब भी न गर धुआँ होता— anujlakhnavi