इक ही तस्वीर निगाहों में बसी है कब से
ज़ेहन पर जैसे तसव्वुर में सजी है कब से
फ़िक़्र-ए-ग़ुर्बत भी नहीं छोड़ती दामन अब तक
भूख भी जैसे कहीं क़ैद रही है कब से
बे-ख़बर तू है मगर मैं ये समझता हूँ अब
रोज़ चीख़ों में कराहों में दबी है कब से
जो हथेली तू उठाती थी दुआ की ख़ातिर
आज जाना है कि काँटों से सनी है कब से
रौशनी देख के मुझ को तो ख़ुशी मिलती थी
किस से पूछूँ कि तेरी आँख जली है कब से
बंद पलकों में कभी ख़्वाब नहीं आता अब
नींद भी दर्द की पहचान बनी है कब से
ख़ुद से मिलना भी गवारा नहीं होता मुझ को
आइना देख लिया धूल जमी है कब से
क़तरा-क़तरा ही सही टूट रही तू अब भी
ख़्वाहिशें छोड़ मलालत में रही है कब से
ख़ुद से जो रंज था अब और बड़ा लगता है
क्यूँकि ख़ामोश निगाहों में नमी है कब से















