मिरा साया तिरे साए से टकराए भला कैसे
न आया जो कभी भी पास जुड़ जाए भला कैसे
न आई रात को मिलने मिली हो दिन के सूरज में
कि दुनिया ने जो समझा है उसे पाए भला कैसे
कभी भी वस्ल की बातें नहीं करती मिरी जानाँ
कि शब भर रोज़ सोता हूँ अज़ा लाए भला कैसे
फ़क़ीरों की न बातें सुन सभी कहते है माया दे
बड़ी मुश्किल से पाई जो वो ठुकराए भला कैसे
दरीचे में दिखा था वो दरीचे अब नहीं खुलते
नहीं दिखता जो चेहरा अब उसे भाए भला कैसे
— arjun chamoli















