आप के लिए
कभी हँसता था खिल-खिल कर कभी थी ज़िंदगी मेरी
ये मजबूरी ये रुस्वाई ये बर्बादी हुई मेरी
मैं अपने आप में अब तन्हा पहचाने हैं अनजाने
घुटन के साथ अब है ये सिमटती ज़िंदगी मेरी
गुनाहों की सज़ा होती तो सह लेता ख़ुशी से मैं
ख़ता के बिन जहन्नम सी है नज़्म-ए-ज़िंदगी मेरी
मुझे क्या इल्म था इल्ज़ाम झूठा भी लगाते हैं
जलन दुनिया की इतनी क़त्ल कर दी शख़्सियत मेरी
न घुटकर मौत आती है न घुटकर कोई जी सकता
मुझे महसूस होता है ये ज़िंदा लाश है मेरी
कभी दुश्मन नहीं थे सब कभी थी दोस्ती सब से
न कोई दोस्त लगता अब न कोई दुश्मनी मेरी
मेरे दिल में न कुछ बाक़ी जो अब भी टूट सकता हो
ये टुकड़े जी रहे क्यूँ-कर हैं हैरानी बढ़ी मेरी
मुझे नफ़रत हुई ख़ुदस मैं क्यूँ कमज़ोर हूँ इतना
मैं ख़ुद आया तेरे दर पे या क़िस्मत लाई है मेरी
बहुत कुछ कह नहीं पाता बहुत कुछ कह भी जाता हूँ
समझ में जो नहीं आए वो बस तस्लीम है मेरी
तुझे आग़ाज़ करना है तुझे अंजाम है देना
मिले मंज़िल नहीं मुझ को तो ये तक़दीर है मेरी
मुझे मंज़ूर है मिटना मुझे मंज़ूर मरना पर
मुझे जीने की ख़ातिर चाहिए आवारगी मेरी
तू उतरी आसमाँ से है यहाँ धरती पे आई है
फ़रिश्ता लग रही है तू ज़रूरत बन गई मेरी
चलो ये बात छोड़ें अब चलो वो बात करते हैं
कि ख़ुशबू बन के फैले कामयाबी की महक तेरी















