"कभी वक़्त था"
कभी वक़्त था देखा था उसे शर्माते हुए
अपने आँचल को मेरे हाथों से बचाते हुए
अकेले मिलने पर मुझ को रिझाते हुए
मेरे हाथों से अपनी उँगलियाँ छुआते हुए
सुनसान जगह पर ख़ुद को पीछे हटाते हुए
जानी पहचानी जगह पर शोख़ी बढ़ाते हुए
वो दौर था ख़ुश थे एक दूजे को सताते हुए
और थक जाते थे नाराज़ को मनाते हुए
प्यार है या नहीं डरते थे ये बताते हुए
क़रीब रहते थे अपने अरमाँ जगाते हुए
वही वक़्त फिर से चाहता है 'अर्जुन'
बाँहों में ले-ले वो मुझ पे हक़ जताते हुए
— arjun chamoli















