"यार"

यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी
मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं

जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी
छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं

बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी
उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं

सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई
बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं

अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी
तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं

अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी
कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

— Arpit Sharma

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