chhod kar aankhe qareene se nikal aa.e hain | छोड़ कर आँखे क़रीने से निकल आए हैं

  - A R Sahil "Aleeg"

छोड़ कर आँखे क़रीने से निकल आए हैं
ग़म के बादल भी पसीने से निकल आए हैं

आप जिस शख़्स के होंठो से लगे बैठे हो
हम उसी शख़्स के सीने से निकल आए हैं

एक वो है जो मसाजिद में ख़ुदा ढूँढते है
एक हम है के मदीने से निकल आए हैं

या ख़ुदा मैं भी मिला उनसे महीने के बाद
या ख़ुदा वो भी महीने से निकल आए हैं

मसअला जिनका सुलझना था मियाँ नामुमकिन
उनके हल देखिए पीने से निकल आए हैं

अनसुना करते हुए दिल के हर इक जुमले को
आज हम बच के कमीने से निकल आए हैं

मैं लुटा बैठा बहुत पहले अक़ीक़-ओ-गौहर
साँप बाक़ी थे ख़ज़ीने से निकल आए हैं

साथ लाया था मैं अहबाब सफ़र को 'साहिल'
दुश्मन-ए-जाँ तो सफ़ीने से निकल आए हैं

  - A R Sahil "Aleeg"

Rahbar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by A R Sahil "Aleeg"

As you were reading Shayari by A R Sahil "Aleeg"

Similar Writers

our suggestion based on A R Sahil "Aleeg"

Similar Moods

As you were reading Rahbar Shayari Shayari