मेरे अल्फ़ाज़ की ता'बीर हो तहरीर भी तसनीफ़ भी हो शा'इरी की तुममगर अब इश्क़ के इस संग-दिल बस्ती में कोई शा'इरी मुझ से नहीं होती— A R Sahil "Aleeg"