उस को हर इक फूल मिला फुलवारी से
हम को काँटे रोज़ मिले तय्यारी से
उस का बचपन हाए लगा मुझ को ऐसे
बा'द मैं उस के रोज़ डरा किलकारी से
तीन दिवस जब बीत गए उस के घर में
चार पुराने ख़त निकले अलमारी से
सुना है मैं ने बेच रहे हो तुम दिल को
सच है तो फिर बात करें पटवारी से
देखा आख़िर हार गया ना वो उस से
कैसे लड़का रोज़ बचे बेचारी से
और ये क्या-क्या ले कर मुझ से मानेगी
नहीं पता क्या रिश्ता है फ़नकारी से
— Aryan Mishra















