क़सम झूठी मैं खाना चाहता हूँ
वफ़ा सच्ची जताना चाहता हूँ
तुझे काग़ज़ बनाना चाहता हूँ
क़लम अपनी चलाना चाहता हूँ
रिवाज-ओ-रस्म से बीमार हूँ मैं
दवा उस की कराना चाहता हूँ
मुझे ये होंठ अपने काटने है
सबब पायल बनाना चाहता हूँ
कभी दिल तोड़ कर मैं लड़कियों के
नदी उल्टी बहाना चाहता हूँ
मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मैं विष दवा है
सो इस को आज़माना चाहता हूँ
अमावस रात की जो रौशनी है
नज़र उस से मिलाना चाहता हूँ
रसोई तेल से ख़ाली पड़ी है
दिए घर के बुझाना चाहता हूँ
ज़मीं जिस से मुझे उस ने निकाला
वही पर घर बनाना चाहता हूँ
नशे में हूँ बताना मत नशे को
ज़रा सा डगमगाना चाहता हूँ
यहाँ से देख कर मैं बचपने को
घड़ी वापस घुमाना चाहता हूँ















