कोई बिछड़े तो उसे हिज्र मनाने दीजे
गिर्या करता है करे गाए तो गाने दीजे
हिज्र का बोझ है अल्फ़ाज़ से उठने का नहीं
रोने वालों को तसल्ली नहीं शाने दीजे
मुर्शिदा लोग तो मिटते ही चले जाते हैं
मुझ पे जो इश्क़ में गुज़री है बताने दीजे
अभी अंजान है नादान है नौ-वारिद-ए-दश्त
हजरत-ए-इश्क़ से कहना है कि जाने दीजे
मालिक-ए-अस्र-ए-अज़ल आप के शायाँ तो ये है
चंद लम्हे कोई माँगे तो ज़माने दीजे
जानता हूँ शब-ए-हिज्राँ की तलावत 'अशफ़ाक़'
लोग अंदाज़े लगाते हैं लगाने दीजे
— Ashfaq Nasir














