लम्हों में नहीं, सदियों में गुज़र रही
सुब्ह - शाम तो ठीक है
ये रात क्यूँ आँखों में गुज़र रही
तेरा होना है एक बात
साथ होना अलग बात
हर एक बात हो रही
लेकिन फिर भी ये ख़लिश नहीं जाती
ज़िन्दगी गुज़र तो रही है लेकिन
तेरे साथ तो नहीं गुज़र रही
— Ashish Anand















