निशाना लगाओ मगर ध्यान से
करो तुम अलग देह को जान से
न हिम्मत हुई काश कहता उसे
दुखा दिल बहुत आज अपमान से
गिने जा रहे आदमी फिर सभी
रहे खेल जो प्रेम ईमान से
हसीं आ गई देख के सादगी
मुझे हो गया प्रेम अंजान से
कफ़न हो गई रेशमी शाल भी
न ले जा सके बालियाँ कान से
कहाँ कौन कितना फ़रेबी हुआ
कभी पूछ लेना गिरेबान से
बहाते नहीं ख़ून सुन इश्क़ में
लड़कपन बचाओ लहू दान से
— Aman Vishwakarma 'Avish'















