Aman Vishwakarma 'Avish'

Aman Vishwakarma 'Avish'

@av5430121

Aman Vishwakarma 'Avish' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aman Vishwakarma 'Avish''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ठहर कर मुझे फिर वहीं देख लेना मुझे हार कर तुम जहाँ से गए थे — Aman Vishwakarma 'Avish'
वो कहाँ की महानता बोलो जो तबस्सुम पे हम-रहाँ हो लो — Aman Vishwakarma 'Avish'
जिस तरह से वो बलाएँ दे रहा है वो मुझे शायद दुआएँ दे रहा है — Aman Vishwakarma 'Avish'
यार अब हिचकियाँ नहीं आती याद वो अब मुझे नहीं करता — Aman Vishwakarma 'Avish'

Ghazal

सुनो भाई मुबारक हो खरा सौदा मिला तुम को उगाया शूल फिर बदले वही काँटा मिला तुम को बहुत मुश्किल हुई लेकिन चलो मंज़िल तलक आए यहाँ जिस वास्ते आए बताओ क्या मिला तुम को ख़ुदा ने सोच कर के ये नहीं ज़्यादा दिया तुम को उसे तुम भूल जाओगे अगर ज़्यादा मिला तुम को जहाँ पर फेंक के पायल घड़ी देखा निकल भागी उसी बरगद तले क्या कंद का पौधा मिला तुम को हुआ नुक़्सान होगा जब वफ़ा का इस लिए शायद बहुत बोला करे जो आदमी गूॅंगा मिला तुम को सजे बिंदी नचे बाली जचे कंगन मगर बोलो मिरा दिल तोड़ने के बा'द क्या मुझ सा मिला तुम को बहुत पहले लुटाया दिल बहुत पहले मोहब्बत में जहाँ टूटा कभी था दिल वहाँ टुकड़ा मिला तुम को मुहल्ले में बड़े बाबू नई मोटर घुमाते जब मुहल्ला पूछता है और क्या गौना मिला तुम को — Aman Vishwakarma 'Avish'
समझते है हमें बेकार कैसे ठीक वैसे ही मिला हम को नहीं लोहार कैसे ठीक वैसे ही पिघल तो हैं गए लेकिन अभी आकार लेना है हमें भी तो मिले आधार कैसे ठीक वैसे ही दबे पैरों चली है जो वही फिर ख़ाक छानेगी बटोरेगी कभी अख़बार कैसे ठीक वैसे ही सलामत है कली गुलदान की है पास मेरे जो कहीं देते उसे भी मार कैसे ठीक वैसे ही फ़रिश्ता आ रहा था फिर अचानक से मुड़ा भागा बना आ कर यहाँ लाचार कैसे ठीक वैसे ही चलो ऐसा करो मुझ को लहू के रंग में रंगो सहोगे क्या क़लम का वार कैसे ठीक वैसे ही कभी आवाज़ देना फिर दिखाना चाँद सा मुखड़ा बनूँ तेरे लिए गुलज़ार कैसे ठीक वैसे ही गले तक आ गई ऐसे दबी सी बात दीवाने कभी आती नहीं इस बार कैसे ठीक वैसे ही करे है धर्म का धंधा मरी इंसानियत है सब कभी लेंगे ख़ुदा अवतार कैसे ठीक वैसे ही सभी जाने बताओ तुम अमन को जानते हो क्या कि जानेगा कभी संसार कैसे ठीक वैसे ही — Aman Vishwakarma 'Avish'
वकीलों से फ़रेबी की क़बीलों से बग़ावत की निगाहों को पढ़ा जिस ने उसे दिल से मुहब्बत की ख़ुदा भी बोल बैठा ये ग़ज़ब अपवाद है प्यारे बताओ कौन है जिस ने मोहब्बत में शिकायत की परख के देख ले जो माँग अपनी जान रख दूँगा ज़रा सा मुस्कुरा दे माँ न कर तू बात क़ीमत की बहाते आँख से मोती लड़ाते दाल से रोटी ग़रीबों को हमेशा से सज़ा मिलती इबादत की सड़क पे आबरू को नोचती बाज़ार गीदड़ है जलाती याद में फिर मोम-बत्ती चार लानत की जिन्हें भी देखने का शौक़ है उन को दिखाऊँगा बिछा के लाश सिक्कों की बना शमशान दौलत की पली है ज़िंदगी सबकी मिली जो भीख बादल से जहाँ में कौन करता क़द्र बूॅंदों की इनायत की — Aman Vishwakarma 'Avish'
बड़ी मेहनत है की मैं ने उसे फिर भूल जाने में मोहब्बत छोड़ आया मैं फ़रेबी के ज़माने में लिखे हैं शे'र उस की याद में ख़ाली घरौंदे में रही है मुफ़्लिसी ही साथ मेरे आशियाने में उसे पहचानने के वास्ते मुड़ के तके नैना जिसे अब शर्म आती है मुझे अपना बताने में अकेले तीरगी-ए-शब मिटा देता जहाँ भर के अगर बाज़ार में माचिस मिले जो चार आने में कभी तो रौशनी मुझ पे ख़ुदाया ख़ूब डालेगा ख़ुदा को वक़्त लगता है नया सूरज बनाने में अकेला शा'इरी करता पिता के बा'द घर में मैं घुटा करता गँवा देता कला जो मैं कमाने में भरोसा है मुझे उस पर कभी ईमान डोलेगा उसी के हाथ कापेंगे मेरा नंबर मिलाने में बिछड़ के आज तक मैं आशिक़ी कर ही नहीं पाया समय लगता नहीं महबूब भी उन को पटाने में — Aman Vishwakarma 'Avish'
बात कर रही आँखें सुन रहा हमारा दिल प्रेम में पड़ा तब से हो गया नकारा दिल मैं जला रहा था दिल रौशनी सजाने को रात चाँद ने भी जब कर लिया किनारा दिल छोर पर गली के उस प्रेम जब लिखा मैं ने क्यूँँ नहीं भला तुम ने यार फेंक मारा दिल बाँध खोल ज़ुल्फ़ों को खेलती कभी जो तुम होंठ के दरीचे के आस पास हारा दिल आजकल वफ़ा मिलती फ़ोन में किराए पर चाहिए ख़रीदो तुम फिर करो गुज़ारा दिल एकजुट सभी जुगनू जब हुए बहाने से तब कहीं बना होगा आप का शरारा दिल चार पाँच सिक्के हैं जेब में पड़े हुए मैं ख़रीद लूँ कैसे आप का सितारा दिल चौंक तो रहे ऐसे जानते नहीं हो कुछ मौन है 'अमन' या'नी हो चुका ख़सारा दिल — Aman Vishwakarma 'Avish'

Nazm

"सवारी" तुम्हारी भी कहानी है हमारी ही कहानी सी बदल कर जी रहे सूरत हुई है रेत पानी सी नहीं केवल ग़मों ने मारना चाहा हमें अक्सर सभी ख़ुद्दार लोगों ने हमीं से बद-गुमानी की भरोसे पे चले थे वो हमें पहले बचाएगा हमें मालूम थोड़ी था भरोसा बेच खाएगा चली बंदूक सी आँखें निगाहें फेरते ही जब कभी सोचा नहीं खारा लहू सागर बनाएगा यक़ीनन मानते थे हम बड़ा प्यारा हुआ करता मोहब्बत में ज़रा पागल बड़ा पागल हुआ करता बता दो नाथ तुम ने क्यूँँ भला ये चीज़ दी हम को वफ़ा देकर सज़ा दी क्यूँँ नहीं उम्मीद दी हम को लगी है जंग काग़ज़ पर अदावत रोज़ जारी है पड़े टूटे हुए चक्के यही जीवन सवारी है — Aman Vishwakarma 'Avish'