आप आए इसी लिए शायद
आँख से मोतियाँ बहे शायद
फूल हठ कर बना हुआ पत्थर
हम उसी रास्ते चले शायद
एक दिल को नहीं मिटा पाया
जब मिटे प्रेम तब मिटे शायद
यार जज़्बात सब बहाने हैं
काश वो फिर कहीं मिले शायद
आग से और आदतों से भी
फिर अना की डगर जले शायद
रोज़ इस आस में लिखा करते
यूँ कभी साथ में पढ़े शायद
चाँद भी तीरगी मिटाता है
सुब्ह कल इश्क़ में खिले शायद
— Aman Vishwakarma 'Avish'















