अभी आँख खोली अभी ढल रही है
मुझे बंदगी अब बहुत खल रही है
भरी जेब मेरी कभी भी नहीं थी
हया बेच कर ज़िंदगी पल रही है
दुखी आदमी आस में भी कमी है
उसे भ्रष्ट सरकार जो छल रही है
इधर दाल चावल सड़े बोरियों में
उधर फिर बदन भूख से गल रही है
कभी मीडिया चोख काँटा चुभाए
किसी के लिए नर्म मख़मल रही है
उजाले हुए है घरों में उसी के
जहा लौ दिलों में सहज जल रही है
— Aman Vishwakarma 'Avish'















