यार सपने देख के मैं डर न जाऊँ

राह तकते मैं अचानक मर न जाऊँ

है तमन्ना रब बनाऊँ मैं बड़ा घर
घर बने जो फिर कभी मैं घर न जाऊँ

चाल दुर्योधन नहीं शकुनी चले है
डर मुझे है हार फिर चौसर न जाऊँ

हार के ऐसा लगे अब क्या करेंगे
कामयाबी के लगा लंगर न जाऊँ

लोग छेड़ेंगे वहाँ फिर बात उस की
बस यही मैं सोच के दफ़्तर न जाऊँ

आप जो दिल के बगल में दिल रखेंगे
बन कही मैं आप का दिलबर न जाऊँ
इश्क़ के सोहबत रहे तो लग रहा है
बन कहीं मैं आदमी बेहतर न जाऊँ

— Aman Vishwakarma 'Avish'

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