सोचा करूँ तुझे ही बेचैन आदमी हूँ
चुप-चाप बह चली जो मैं तो वही नदी हूँ
ये ज़ुल्म बस किया है ज़्यादा वफ़ा किया है
मैं था लहू रगों का अब आँख की नमी हूँ
अरदास कर रहे हैं टूटे हुए घड़ों से
जो उस तलक न जाए गुमराह बंदगी हूँ
मालूम भी नहीं ये वो दिल फ़रेब घर है
होता तबाह कोई मैं भी हुआ अभी हूँ
मैं जो चला गया तो लाली न फिर खिलेगी
काजल सफ़ेद होंगे बर्बाद ज़िंदगी हूँ
बैसाखियाँ सभी जो चलना मुझे सिखाएँ
गिर कर उठा अभी जो उठ के गिरा कभी हूँ
— Aman Vishwakarma 'Avish'















