गाते रहे उसे बिरहा गम-शनास थी

कंगन हुई कभी नथुनी बद-हवा से थी

मुजरिम बना शरीफ़ 'अदालत सहर-नुमा
फिर क़ाबिल-ए-सज़ा अँखिया ना-सिपास थी

ख़ुश हूँ हँसे फ़रेब मुक़द्दर ग़ज़ल करे
कपड़े फटे मिरे बिटिया ख़ुश-लिबास थी

चोटिल नहीं हुई गुड़िया खेल इश्क़ में
दे मशवरा मुझे मदिरा हम-कयास थी

आग़ोश में किताब गिरेबाँ पकड़ गई
हम-ख़ास थी किताब कभी हक़-शनास थी

— Aman Vishwakarma 'Avish'

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