कोई मकड़ी फँसी है बालों में
निख़र आई सफ़ेदी जालों में
क़हक़हा ख़ामुशी में बदला है
ऐसे सन्नाटे गूंजे नालों में
और हालत ख़राब होती है
इश्क़ हो गर ख़राब हालों में
तीरगी में मिला हूँ मुझ से मैं
खो गया था तेरे उजालों में
एक ही शख़्स पर झगड़ते हैं
कैसी ख़ूबी है हम-ख़यालों में
उस को चालें सिखाई हैं मैं ने
मैं ही फँसता हूँ उस की चालों में
कितनी आसाँ बना दी जाती है
एक मुश्किल मेरे ख़यालों में
पैर छू कर विदा किया उस ने
ख़ुशबुएँ बस गई हैं छालों में
मैं ने उलझा दिया जवाबों को
सो वो खुलता गया सवालों में
नज़्में ग़ज़लें हो जाती हैं 'सय्यद'
शे'र होता है कोई सालों में















