koi mak | कोई मकड़ी फँसी है बालों में

  - Aves Sayyad

कोई मकड़ी फँसी है बालों में
निख़र आई सफ़ेदी जालों में

क़हक़हा ख़ामुशी में बदला है
ऐसे सन्नाटे गूंजे नालों में

और हालत ख़राब होती है
'इश्क़ हो गर ख़राब हालों में

तीरगी में मिला हूँ मुझ सेे मैं
खो गया था तेरे उजालों में

एक ही शख़्स पर झगड़ते हैं
कैसी ख़ूबी है हम-ख़यालों में

उसको चालें सिखाई हैं मैंने
मैं ही फँसता हूँ उसकी चालों में

कितनी आसाँ बना दी जाती है
एक मुश्किल मेरे ख़यालों में

पैर छूकर विदा किया उसने
ख़ुशबुएँ बस गई हैं छालों में

मैंने उलझा दिया जवाबों को
सो वो खुलता गया सवालों में

नज़्में ग़ज़लें हो जाती हैं 'सय्यद'
शे'र होता है कोई सालों में

  - Aves Sayyad

Ishq Shayari

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