हर किसी पे ग़ौर है
इक अलग ही दौर है
फोन पर थी दूसरी
शा'इरी में और है
ख़्वाहिशें क्यूँ कम करें
चाहतों का दौर है
कॉल पर ही हो गया
क्या ग़ज़ब का तौर है
साथ वो देगा नहीं
मतलबी ये दौर है
— ABHISHEK RANJAN
इक अलग ही दौर है
फोन पर थी दूसरी
शा'इरी में और है
ख़्वाहिशें क्यूँ कम करें
चाहतों का दौर है
कॉल पर ही हो गया
क्या ग़ज़ब का तौर है
साथ वो देगा नहीं
मतलबी ये दौर है
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