वक़्त है वक़्त पर बदलता है
ऐ मेरे दिल तू क्यूँ मचलता है
चाँद तन्हा है हाँ मगर फिर भी
देखो ना शान से निकलता है
ठोकरों से नहीं तू घबराना
कीचड़ों में कमल निकलता है
मुझ को उम्मीद है वो आएगा
ये बुरा दौर भी तो ढलता है
वार करता है कोई अपना ही
आज के दौर में ये चलता है
कोई अपना कहाँ यहाँ 'रंजन'
आदमी आदमी से जलता है
— ABHISHEK RANJAN















