मेरे बस में अगर होता ख़िज़ाँ आने न देता मैं
तुम्हारी याद के फूलों को मुरझाने न देता मैं
पता होता अगर मुझ को हवा का क्या है मंसूबा
हवा को शम्अ के नज़दीक तक आने न देता मैं
तुम्हें नग़्मों से वहशत है मुझे मालूम होता गर
परिंदों को शजर की शाख़ पे गाने न देता मैं
तुम्हारी याद बन जाएगी 'जस्सर' पैरों की ज़ंजीर
ख़बर होती तो अपने साथ में आने न देता मैं
— Avtar Singh Jasser















