उस की ठोकर में आ गया पत्थर

बन ने वाला है क्या से क्या पत्थर

ग़म की खाई में गिरने वाला है
ये मेरा दिल ये सरफिरा पत्थर

दूर से मोम लग रहा था मुझे
पास आने पे बन गया पत्थर

कुछ भी कर लो मगर ये दुनिया है
रोज़ फेंकेगी इक नया पत्थर

क्या से क्या इक नदी पे बीत गया
उस के हाथों से जब गिरा पत्थर

पूजता था ख़ुदा समझ के मगर
एक दिन उस पे हँस पड़ा पत्थर

कल समुंदर ने हाथ जोड़ लिए
मुझ से फेंका नहीं गया पत्थर

प्यार करते हुओं की रुसवाई
एक खिड़की को तोड़ता पत्थर

तुझ से टकरा के चूर हो जाए
तेरे नज़दीक है ही क्या पत्थर

क्यूँ तराशा नहीं गया तुझ से
मैं तेरे हाथ ही का था पत्थर

तू मेरी नाज़ुकी से वाक़िफ़ है
कम से कम तू तो मत उठा पत्थर

मेरी सिसकी भी सुन न पाओगे
तुम ने देखा नहीं हुआ पत्थर

— Ayesha Shafaq

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