"कशिश"
उस सम्त जाने का मन होता है
जाता हूँ
सोचता हूँ
कहीं सच में ही मन है या
कोई और दुश्मन है
जो मुझ को खींच लेता है
और आँखें मींच देता है
वो जो मुझ को दिखाता है
मैं वो ही देख पाता हूँ
और जो मैं देख लेता हूँ
तो ख़ुद को रोक नहीं पाता हूँ
उस सम्त जाने का मन होता है
जाता हूँ
सोचता हूँ
इस सम्त जा कर के
कि मैं ने क्या कमाया है
या मैं ने ख़ुद को खोया है
या किसी को पाया है
या किसी ने सब कुछ खो कर
मुझ को पाया है
सब कुछ पाकर भी मैं जब
खो ही जाता हूँ
तो फिर उस सम्त जाने का मन होता है
जाता हूँ
— Aayush Maikhuri















