ज़मीन-ए-दिल इक अर्से बा'द जल-थल हो रही है

कोई बारिश मेरे अंदर मुसलसल हो रही है

लहू का रंग फैला है हमारे कैनवस पर
तेरी तस्वीर अब जा कर मुकम्मल हो रही है

हवा-ए-ताज़ा का झोंका चला आया कहाँ से
कि मुद्दत बा'द सी पानी में हलचल हो रही है

तुझे देखे से मुमकिन मग़्फ़िरत हो जाए उस की
तेरे बीमार की बस आज और कल हो रही है

वो साहब आ ही गई बंद-ए-क़बा खोलने लगे हैं
पहेली थी जो इक उलझी हुई हल हो रही है

— Azhar Iqbal

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