is se pahle ki koii aur hata de mujh ko | इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को

  - Balmohan Pandey

इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को
अपने पहलू से कहीं दूर बिठा दे मुझ को

मैं सुख़न-फ़हम किसी वस्ल का मुहताज नहीं
चाँदनी रात है इक शे'र सुना दे मुझ को

ख़ुद-कुशी करने के मौसम नहीं आते हर रोज़
ज़िंदगी अब कोई रस्ता न दिखा दे मुझ को

एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को
चारागर ठीक न होने की दवा दे मुझ को

यूँँ तो सूरज हूँ मगर फ़िक्र लगी रहती है
वो चराग़ों के भरम में न बुझा दे मुझ को

तुझ को मा'लूम नहीं 'इश्क़ किसे कहते हैं
अपने सीने पे नहीं दिल में जगह दे मुझ को

हर नए शख़्स पे खुल जाने की आदत 'मोहन'
देने वाले से कहो थोड़ी अना दे मुझ को

  - Balmohan Pandey

Self respect Shayari

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