इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को
अपने पहलू से कहीं दूर बिठा दे मुझ को
मैं सुख़न-फ़हम किसी वस्ल का मुहताज नहीं
चाँदनी रात है इक शे'र सुना दे मुझ को
ख़ुद-कुशी करने के मौसम नहीं आते हर रोज़
ज़िंदगी अब कोई रस्ता न दिखा दे मुझ को
एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को
चारागर ठीक न होने की दवा दे मुझ को
यूँँ तो सूरज हूँ मगर फ़िक्र लगी रहती है
वो चराग़ों के भरम में न बुझा दे मुझ को
तुझ को मा'लूम नहीं 'इश्क़ किसे कहते हैं
अपने सीने पे नहीं दिल में जगह दे मुझ को
हर नए शख़्स पे खुल जाने की आदत 'मोहन'
देने वाले से कहो थोड़ी अना दे मुझ को
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