सबा के हाथ पीले हो गए
मैं साअत-ए-सरशार में
लाखों दुआएँ
ख़ूब-सूरत आरज़ुएँ
पेश करता हूँ
सबा मम्नून है
लेकिन ज़बाँ है
कुछ नहीं कहती
सबा अब रोज़ ओ शब
दीवार-ओ-दर तन पर सजाती है
अब आँचल छत का सर पर ओढ़ती है
लम्स-ए-फ़र्श-ए-मरमरीं से
पाँव की तज़ईन करती है
वो कोहसारों शगुफ़्ता वादियों झरनों
चमकते नील-गूँ आकाश के
नग़्में नहीं गाती
सबा अब लाला-ओ-गुल की तरफ़ शायद नहीं आती
सबा शबनम-अदा तस्वीर-ए-पा-बस्ता
दर-ए-रौज़न में आवेज़ां
हसीं नाज़ुक बदन
रौशन मुनव्वर साहिलों पर अब नहीं बहती
सबा लब खोलती है मुस्कुराती है
सबा सरगोशियों में
अब किसी से कुछ नहीं कहती
— Balraj Komal















