फ़लक से ख़्वाब का हर इक सितारा छीन लेती है
ये ज़िम्मेदारी तो बचपन हमारा छीन लेती है
भला हर डूबते का साथ देती है कहाँ क़िस्मत
कभी तिनके तलक का भी सहारा छीन लेती है
मियाँ ये क़र्ज़ का दरिया बहुत ही जानलेवा है
अगर जो इस
में उतरें तो किनारा छीन लेती है
मोहब्बत में सुकूँ खोते हज़ारों रोज़ मेरी जाँ
तुम्हें लगता मगर है बस तुम्हारा छीन लेती है
हमें इस ज़िन्दगी से बंधु इतनी सी शिकायत है
कि क्यूँ जब आँख देती है नज़ारा छीन लेती है
— Deenbandhu Jaiswal















