बस थोड़ी सी और हवा दो कान्हा जी
नफ़रत की दीवार गिरा दो कान्हा जी
जाने कब से दिल का दरिया सूखा है
प्रेम की इस
में धार बहा दो कान्हा जी
जब भी उस सेे मिलने की ख़्वाहिश जागे
उस दिन को इतवार बना दो कान्हा जी
कब तक यूँँ ही नादानों का भटकेगा
दिल को ज़िम्मेदार बना दो कान्हा जी
मैं भी उसका सुख दुख थोड़ा बाँट सकूँ
इतना सा अधिकार दिला दो कान्हा जी
कब से मैं इस मोह भँवर में अटका हूँ
मुझको गंगा पार लगा दो कान्हा जी
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