कौन था जिसके उन तक इशारे गए
बज़्म से यूँँ जो उठकर सितारे गए
जाते जाते गईं सारी फ़नकारियाँ
देखते देखते सब नज़ारे गए
जागते जागते अपनी रातें कटीं
सोते सोते कई दिन गुज़ारे गए
उनकी ख़ातिर हैं हम महज़ इक पैरहन
सुब्ह धारे गये शब उतारे गए
पहले जी भर के रौंदे गये तब कहीं
चाक पर रख के इक दिन सँवारे गए
हाए! प्यासों पे गुज़रेगी कैसी ख़ुदा
वो तो प्यासी नदी के किनारे गए
कोई आवाज़ देता है उस पार से
गर गए तो समझना कि मारे गए
क्यूँँ मुड़े हुस्ने-जानाँ की जानिब 'विकल'
इक हमीं तो नहीं जो पुकारे गए
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