यही मक़्सद रहा है अब हमारी ज़िन्दगी का
कभी मेयार हम गिरने न देंगे शाइरी का
गई थी जान जिस लड़के की इक साज़िश के चलते
ज़माने ने उसे समझा है क़िस्सा ख़ुदकुशी का
पस-ए-पर्दा किसी के सामने मैं खुल न पाया
कहानी में मेरा किरदार था इक अजनबी का
हथेली को मुसलसल देखता रहता हूँ मैं फिर
किसी को हाथ पकड़े देखता हूँँ जब किसी का
सभी महसूस कर पाते नहीं है ख़ामुशी को
ख़ुदा यूँँ कर कि इक चेहरा बना दे ख़ामुशी का
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