यही मक़्सद रहा है अब हमारी ज़िन्दगी का
कभी मेआ'र हम गिरने न देंगे शा'इरी का
गई थी जान जिस लड़के की इक साज़िश के चलते
ज़माने ने उसे समझा है क़िस्सा ख़ुद-कुशी का
पस-ए-पर्दा किसी के सामने मैं खुल न पाया
कहानी में मेरा किरदार था इक अजनबी का
हथेली को मुसलसल देखता रहता हूँ मैं फिर
किसी को हाथ पकड़े देखता हूँ जब किसी का
सभी महसूस कर पाते नहीं है ख़ामुशी को
ख़ुदा यूँ कर कि इक चेहरा बना दे ख़ामुशी का
— Dipendra Singh 'Raaz'















