मैं उसे साथ तो रख लेता किताबों की तरह
पर वो हर साल बदलता है निसाबों की तरह
जब हुआ दिल तो वो आया न हुआ दिल तो नहीं
वो हक़ीक़त में भी आता है तो ख़्वाबों की तरह
As you were reading Shayari by Dipendra Singh 'Raaz'
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