तेरी गली में आए हैं फिर इस भरम पे आज

होगी तेरी निगाह-ए-करम यार हम पे आज

मातम मना रहा है जो तेरे सितम पे आज
ऐ इश्क़ मेरी लानतें उस मोहतरम पे आज

जिन को दिखाई देते थे मुझ में हज़ार ऐसे
वो चल रहे हैं मेरे ही नक़्श-ए-क़दम पे आज

इतने में तुम ने पीठ में ख़ंजर चुभो दिए
हम सोच ही रहे थे तुम्हारे करम पे आज

आ ही गई हमारी भी अब हुस्न पे निगाह
या'नी कि नास्तिक भी है दैर-ओ-हरम पे आज

हम को ये अम्न-ओ-चैन पे क्या ख़ाक लाएगी
जब आ गई तरक़्क़ी ही बारूद-ओ-बम पे आज

— Divakar divyank

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Jalwa Shayari

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